‘Flames 2’ Review: बहुत ही प्यारी सी कहानी जो दिल को छू लेगी

मां-बाप को सबसे ज़्यादा फ़िक्र बच्चों की रहती है। जिसके चलते वो बच्चों को जासूसी करने लग जाते हैं। उनके दोस्तों पर नज़र रखते हैं, उनके टीचरों से जाकर पूंछते रहते हैं। बच्चे अगर हर काम मां-बाप की मर्जी से करें तो सही और अगर अपनी मर्जी से करें तो गलत हो जाते हैं। हिन्दी में T.V.F की ‘FLAMES’ के भाग 2 के पांच एपीसोड कुछ दिन पहले ही आये हैं। जिसके बारे में जानने के लिए एक नज़र देखें।

निर्देशक: अपूर्व सिंह कारकी

लेखक: कुणाल अनेजा

कलाकार: ऋत्विक साहोरे,तान्या मानिकतला, सुनाक्षी ग्रोवर,शिवम काकर, दीपेश सुमित्रा जगदीश

प्लेटफार्म: T.V.F

कहानी उस उम्र के बच्चों की है, जिस उम्र में सिर्फ दो चीजों से डर लगता है। मम्मी और मैथ। दोनों ही समझ में नहीं आते और जब समझ में आते हैं तो पूरी दुनिया ही आसान हो जाती है।

दिल्ली में लक्ष्मी नगर मैट्रो स्टेशन से उतरते ही पढ़ाई की बहुत सारी दुकाने हैं, यानी कोचिंग सेंटर हैं। जहां बारवीं के बाद आई.आई.टी का ख़्वाब या ग्रेजुएश्न के बाद सरकारी नौकरी का ख़्वाब देखने वाले हजारों बच्चों को बहुत कम पैसों में ज्ञान दिया जाता है। इन्हीं बच्चों में से अक्सर कुछ बच्चे ज्ञान लेने के साथ-साथ प्यार भी करना भी सीख लेते हैं और पकड़े भी जाते हैं।

प्रदीप कोशल (दीपेश सुमित्रा जगदीश ) सनशाइन नाम का एक ऐसा हो कोचिंग सेंटर चलाते हैं। इसी सेंटर में एक लड़का रज़त उर्फ रज्ज़ो (ऋत्विक साहोरे) कोचिंग लेने आता है। उसका एक बहुत ही प्यारा दोस्त पांडु (शिवम काकर) उसके साथ रहता है। जिसे देखकर आपको अपने स्कूल का बेस्ट फ्रेंड याद आने लगता है। पांडु को अपनी ही एक कॉमन दोस्त अनुशा (सुनाक्षी ग्रोवर) से प्रेम है। जैसा की ज़्यादातर हो जाता है।

कहानी लेकिन पांडु की नहीं रज़्जो की है। रजत पढ़ने लिखने में अच्छा है, टीचर भी उस पर भरोसा करता है, उसके घरवाले में भी उस पर भरोसा करते हैं और एक लड़की इशिता (तान्या मानिकतला ) भी उस पर भरोसा करती है। रजत को सिर्फ इस बात की परवाह है कि इशिता का भरोसा ना टूटे।

रजत और इशिता दोनों एक दूसरे को प्रेम करते हैं। उन्हें एक दूसरे के साथ रहना अच्छा लगता है। इशिता के पापा इसे बहुत ही साधारण सी बात समझते हैं। रजत की मम्मी और उसके पापा इसे बहुत ही खराब बात समझते हैं। इसी बात के उपर वह लोग रजत का फोन तोड़ देते हैं। रजत कुछ जुगाड़ लगाकर दूसरा फोन लेता है और इशिता को फिर से फोन करने लगता है। रजत की मम्मी जासूसी करते हुए उसका दूसरा फोन भी पकड़ लेती हैं। और यहां से प्यार में प्रोबल्म आ जाती है।

प्रदीप कौशल जिनका खुद का कोचिंग सेंटर किरया ना देने की वज़ह से वज़ह से बंद होने वाला है। वह इश्क़ के डाऊट भी मैथ की थ्योरी से ही सोल्व करते हैं। इस डाऊट को किलियर करने के लिए वो कौन सी इक्वेशन लगाते हैं, इसके लिए सीरीज देखना ज़रूरी है।

सिनेमा की नज़र से

फ्लेम्स का पहला सीजन देखने पर लगता है कि एक बहुत ही हल्की फुल्की सी कहानी है। जो बहुत ही हल्के फुल्कें अंदाज में दिल्ली की गलियों से होती हुई दिल के रास्तों पर दौडने लगती है। एक अच्छे सिनेमा की पहचान यही होती है कि जो स्क्रीन पर चल रहा है उसे अपने अंदर चलता हुआ महसूस किया जा सके। इस काम के लिए पटकथा लेखक की तारीफ करनी होगी, उसने ना कि बहुत ही अच्छे और सच्चे सीन इमानदारी से लिखे बल्कि उन संवादों का इस्तेमाल किया जो बहुत ही साधारण और रियल लगते हैं।

फलेम्स का नेरेशन स्टाइल काफी अलग कहा जा सकता है। हर एपीसोड का नाम किसी गाने के बोल पर है। हर प्रोब्लम का बड़ी आसानी से साइंटिफिक तरीका बताते चलना काफी क्रिएटिव आइडिया है। हर सीन को बिना दर्शकों को बोर किये इतना होल्ड करके रखना कि देखने वाले का मन गुदगुदाने लगे। ऐसा करना हर किसी के बस में नहीं है। निर्देशक की तारीफ करनी होगी वह ऐसा करने में कामयाब रहा।

निर्देशन में हालांकि कुछ खामियां भी रही हैं। एक सीन में बस स्टेंड पर भीगते हुए ब्रेकअप कर रहे किरदारों का सीन दिल्ली से ज़्यादा मुम्बई का लगता है। इशिता के पापा लक्ष्मी नगर के आस-पास रहने वाली लडकियों के पापा की तरह तो नहीं सोचते हैं बल्कि हॉलीवुड की किसी फ़िल्म की तरह सोचते हैं।

एक अच्छा एक्टर वही होता है जो कम सीन होने के बाद भी अपना असर छोड़ जाता है। पांडु के किरदार में शिवम और सोनाक्षी ग्रोवर ने वही काम किया है। शिवम ने स्क्रीन पर वो रंग जमाया है कि बाकी सारे किरदारों से अलग दिखाई देता है। कम लोकेशन में कम किरदारों का बहुत ही अच्छा इस्तेमाल किया है। नीलु डोगरा ने रजत की मां का किरदार भी बहुत ही अच्छे से और इमानदारी से निभाया है।

इन्हीं सीनों पर संगीत ने जैसे सजावट का काम किया है। हालांकि सिनेमाटोग्राफी काफी औसत रही है। कुछ सीन में कमजोर लाइटिंग साफ नज़र आती है।

कुछ बातें जो हज़म नहीं होतीं

इस समय जब सब कॉल फ्री हैं, सबके पास फोन हैं, रजत पी.सी.ओ से एक रूप्या प्रतिमिनिट कॉल क्यों कर रहा है?

रजत की मां फोन वाली बात रज़त के पापा को ना बताने की बड़ी पुराने जमाने वाली शर्त रखती है। उस शर्त को मानकर रज़त चुपचाप जाकर इशिता से ब्रेकअप कर लेता है। रजत का कोचिंग जाना बंद हो जाता है। इस समय कौन सी मम्मी ऐसा करने को कहती है और कौन सा लड़का ऐसा करता है।