‘मिशन ओवर मार्स’: समीक्षा- होंसला हो तो कुछ भी किया जा सकता है

निर्देशक: विनय वैकुल
लेखक: संबित मिश्रा, विनय वैकुल
कलाकार: साक्षी तंवर, मोना सिंह, निधी सिंह, पालोमी घोष, आशीष विधार्थी, मोहन जोशी आदि।

मिशन ओवर मार्स की कहानी सारी दुनिया को उस वक़्त पता चल गयी थी जब हमारे वेज्ञानिकों ने मंगल पर आसानी से फतेह कर ली थी। इसी कहानी से प्रभावित पिछले दिनों अक्षय कुमार की फ़िल्म मिशन मंगल 200 करोड़ से ज़्यादा की कमाई कर गयी।

इस कहानी को लेकिन घर-घर में दर्शक बनाने वाली एकता कपूर ने अपने तरीके से कहने की कोशिश की है।यह आठ एपीसोड की सीरीज जी5 पर देखी जा सकती है। इस कहानी को उन्होंने की चार वेज्ञानिकों मौसमी घोष (मोना सिंह) नंदिता हरिप्रसाद(साक्षी तंवर) नीतु सिन्हा(निधी सिंह) मेघन रेड्डी(पालोमी घोष) के निजी जीवन के जरिये बताने की कोशिश की है।

यह चारों भारतीय अंतरिक्ष संस्थान इसरो की वैज्ञानिक हैं। इन चारों के आपस में विचार नहीं मिलते हैं। यह चारों एक ही टीम के रूप में काम करती हैं और मिशन ओवर मार्श को कामयाब बनाती हैं।

कहानी चंद्रयान 2 के विफल होने से शुरू होती हैं। जिसके विफल होने के बाद भारतीय सरकार को अपने ही वैज्ञानिकों पर भरोसा नहीं रहता है। वह उन्हें अगले प्रोजेक्ट पर बजट देने से मना कर देती है। इसरो के निर्देशक (आशीष विधार्थी) किसी तरह सरकार से बजट तो ले आते हैं लेकिन बजट के अलावा भी इस राह में बहुत सी मुश्किलें हैं।

इसरो के अंदर भी वैज्ञानिकों की आपस में नहीं बनती है। वह एक दूसरे से जलते हैं, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। मिशन  को रोकने और उसे फैल करने की योजना बनाते रहते हैं। क्योंकि मिशन को चार महिलाएं लीड कर रही हैं।

इन चारों महिलाओं के साथ ऑफिस में ही नहीं इनके घरों में भी बहुत सारी दिक़्कतें चल रही हैं। एक अपने बेटे का फोन टेप कर रही है। एक अपने लिए पार्टनर खोज़ रही है। एक हर काम मुहुर्त से करती है और एक अपने एक्स पति से परेशान है। यह चारों महिलाएं इसके बाद भी सबको मात देकर मंगल पर फतेह कर लेती हैं।

सिनेमा की नज़र से

इस सीरीज का स्क्रीनप्ले जिस तरह से लिखा गया है। यह महिलाओं को तो शिखर पर पहुंचा देता है लेकिन उनके साथ काम करने वाले कुछ आदमियों को बहुत गिरा देता है। वह आदमी भी जबकि वैज्ञानिक हैं और अपने ही देश के हैं।

मोहन जोशी जैसे बड़े कलाकार का निर्देशक कोई फायदा नहीं उठा पाया। निर्देशक इसरो जैसा माहोल बनाने में भी नाकामयाब रहा। सारे किरदार वैज्ञानिक हैं। वह किसी बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने की जगह एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए साजिश रच रहे हैं। किसी को अपने प्रोजेक्ट से ज़्यादा बी.वी को घुमाना ज़रूरी है, कुछ मिशन से अलग हट जाते हैं, जो मिशन में हैं वे भी इतने लापरवाह हैं कि सिस्टम रिबूट करना भूल जाते हैं। किरदार वैज्ञानिक कम कलर्क ज़्यादा लगते हैं। निर्देशक को तक़नीकी ख़ामियों पर और झोड़ा ज़्यादा ध्यान देना चाहिए था।

निर्देशक का फोकस जहां मार्श पर जाने को लेकर होना चाहिए था। उसकी प्रोब्लम को दिखाने के लिए होना चाहिए था। निर्देशक ने उसकी जगह किरदारों की पर्शनल लाईफ पर ज़्यादा जोर दिया है। उनकी प्रोब्लम को ज़्यादा दिखाया। लोकेशन बहुत ज्यादा चेंज नहीं होती हैं। निधि सिंह के घर के सारे सीन एक ही जैसे लगते हैं। ड्रामा बीच-बीच में कब मैलोड्रामा में बदल जाता है पता ही नहीं चलता।

सिनेमाटोग्राफी काफी हद तक सही रही है। संगीत भी ठीक है और गाने के तोर पर रंग दे बसंती का गाना नहीं पता कितना फिट बैठता है। इन सबके बावजूद आठ एपीसोड़ की सीरीज अंत तक आते-आते जोश से भर देती है। देखने वालों को भी लगने लगता है, इस बार तो बस हम पहुंच ही जायें।